देश की राजधानी दिल्ली से करीब 300 किलोमीटर दूर चूड़ियों के शहर फिरोजाबाद का एक छोटा सा कस्बा है जसराना. कहने को तो फिरोजाबाद में चूड़ियों का विश्वप्रसिद्ध चूड़ी कारोबार इसी कस्बे की देन है. इसी छोटे से कस्बे के कुछ कारीगरों ने इस शहर में आकर काम शुरू किया और इसे बुलंदियों की ऊंचाई तक पहुंचाया. मगर आजकल यह कस्बा जाना जाता है महामाई कामाख्या के भक्तों पर बरसते कृपासागर की वजह से.
70 के दशक में कस्बे से दूर एक तालाब के किनारे आये एक संत ने यहां एक झोंपड़ी डाली और रहना शुरू कर दिया. धार्मिक मन के लोग इस संत के प्रवचन सुनने के लिए सुबह शाम यहां पहुंचते थे. इस संत का नाम था श्रीश्री 1008 स्वामी श्री माधवानंद जी महाराज. यहीं पर एक काली माता की मूर्ति थी जो राह चलते सड़क से दिखाई देती थी. संत ने इस मूर्ति की पूजा-अर्चना शुरू की तो यहां थोड़े ही दिन बाद भक्तों की भीड़ जुटना शुरू हो गयी.
धीरे-धीरे यह स्थान लकड़ी की एक अस्थाई चाहरदीवारी का आश्रम बन गया नाम रखा टकापरेसी आश्रम. स्वामी माधवानन्द जी महाराज माता कामाख्या के भक्त थे. 80 के दशक में यहां भक्तों की मदद से स्वामी जी ने माता कामाख्या की एक दिव्य मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा का आयोजन किया. माता की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा हुई तो उनके चमत्कार भी दिखने लगे. कार्यक्रम के बाद माता के श्री चरणों से जलधारा बह निकली. बड़ी दूर-दूर से लोग इस जलधारा के दर्शन के लिए आने लगे. यहां दिखे चमत्कार से स्वामी जी को बड़ी चिंता हुई. उनका मकसद लोगों को मां कामाख्या का चमत्कार दिखाना नही, भक्तों को माता की भक्ति के लिए आमंत्रित करना था.
प्रकांड विद्वानों को बुलाकर स्वामीजी ने अनुष्ठान कराया और जलधारा को किसी तरह शांत किया. इसके बाद यहां मां के दर्शन के लिए भक्तों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती चली गयी. आश्रम का नाम भी बदलकर मां कामाख्या धाम हो गया. आश्रम में भक्तों की संख्या बढ़ी तो आवश्यकता के अनुसार इसका आकार भी बढ़ता चला गया और इस स्थान का विकास भी हुआ.
90 के दशक में स्वामी माधवानंद जी महाराज ब्रह्मलीन हो गये. आश्रम में अंदर जाते हुए उनकी समाधि के दर्शन होते है. वर्तमान में स्वामीजी के शिष्य श्री महेशानंद जी महाराज इस आश्रम के कर्ताधर्ता है. उनके कुशल नेतृत्व में यहां साल में कई बार बड़े आयोजन होते है. दोनो नवरात्र में मां के दर्शन की विशेष व्यवस्था की जाती है. इसके अलावा 21 से 25 जून तक चलने वाले श्री अम्बुवाची महोत्सव के दौरान मां कामाख्या के दर्शनमात्र से जन्मों के पाप कट जाते है.
