उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के विधायकों के विरोध के चलते नजूल भूमि विधायक फंस गया है. विधानसभा के बाद इसे विधान परिषद में पेश किया गया जहां से इसे प्रवर समिति को भेज दिया गया है. उच्च सदन में यह विधेयक पास ना हो सका. इस विधेयक का सत्तादारी गठबंधन के ही कई नेता विरोध कर रहे हैं.
उत्तर प्रदेश में सरकारी जमीनों पर हुए अवैध कब्जों के खिलाफ यूपी सरकार नजूल भूमि विधेयक लेकर आई है. यह विधेयक विधानसभा में पास होने के बाद उच्च सदन में अटक गया. वजह यह रही कि विधेयक का भाजपा के ही कई नेताओं ने विरोध किया है. इसके अलावा एनडीए में शामिल भाजपा की सहयोगी निषाद पार्टी और अपना दल ने इससे असहमति जताई है.
नजूल भूमि का मतलब ऐसी भूमि या भवन से है जो सरकारी दस्तावेज के आधार पर सरकार की संपत्ति है. शहरों में स्थित ऐसी सभी संपत्तियां, भूमि या भवन जो सरकार के हैं, नजूल संपत्तियों कहलाती हैं. इनमें वह भी संपत्तियां शामिल हैं जिनके लिए सरकार ने सूचना द्वारा घोषित किसी कानून के तहत पट्टा, लाइसेंस या कब्जा दिया गया है.
विधेयक के अनुसार कानून लागू होने के बाद किसी भी नजूल भूमि को किसी निजी व्यक्ति या निजी संस्था के पक्ष में पूरा मालिकाना हक हस्तांतरित नहीं किया जाएगा. इसके बजाय भूमि का इस्तेमाल सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए जरूरी हो जाएगा. विधेयक में प्रस्ताव है कि नजूल भूमि को निजी व्यक्तियों या संस्थाओं को हस्तांतरित करने के लिए कोई भी अदालती कार्रवाई या आवेदन रद्द कर दिया जाएगा और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि यह भूमि सरकारी नियंत्रण में रहे.
यदि इस संबंध में कोई धनराशि जमा की गई है तो ऐसे जमा किए जाने की तारीख से उसे भारतीय स्टेट बैंक की मार्जिनल कॉस्ट आफ फंड्स बेस्ट लेंडिंग रेट की ब्याज दर पर धनराशि वापस की जाएगी.
उत्तर प्रदेश के कई बड़े शहरों में सरकार की बेशकीमती नजूल भूमि है. मेरठ में ऐसे सैकड़ो मामले हैं जहां पर निजी व्यक्तियों ने नजूल भूमि पर अवैध कब्जे कर रखे हैं. अवैध कब्जेदारों में बीजेपी के जनप्रतिनिधि, बीजेपी से जुड़े हुए नेता और कार्यकर्ता भी शामिल हैं. आमतौर पर ऐसी संपत्तियों को जिला प्रशासन लिस्टेड रखता है और उसे संरक्षित करता है.
मगर इस जिले में बड़े तादाद में ऐसी संपत्तियों जिला प्रशासन के अफसरों के संरक्षण में सत्ता से जुड़े हुए लोगों को कब्जा करने दी गई हैं. जिला प्रशासन ने इन्हें खाली करने के लिए कोई भी प्रयास नहीं किए हैं. जो प्रयास हुए हैं वह केवल कागजी घोड़े की तरह दौड़ रहे हैं.
बीजेपी के कुछ नेताओं ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समक्ष इस विधेयक को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त की थी. इसके बाद भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और बृजेश पाठक की बैठक हुई. बैठक में तय हुआ कि भूपेन्द्र चौधरी विधेयक को प्रवर समिति को भेजने का प्रस्ताव रखेंगे.
गुरुवार को उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने विधान परिषद में विधेयक पेश किया और भूपेन्द्र चौधरी ने इसे समिति को सौंपने का प्रस्ताव रखा. जिसे भाजपा के एमएलसी और दोनों उपमुख्यमंत्रियों ने समर्थन किया. सभापति कुंवर मानवेंद्र सिंह ने सदन के विधेयक पर विचार के लिए वोटिंग कराई. प्रवर समिति दो महीने में इस पर अपनी रिपोर्ट देगी.
नजूल भूमि विधेयक के विरोध में एनडीए में शामिल निषाद पार्टी, अपना दल ने भी अलग राय रखी है. वहीं समाजवादी पार्टी, जनसत्ता दल, कांग्रेस ने भी इसका जबरदस्त विरोध किया है. समाजवादी पार्टी के आर के वर्मा, कमाल अख्तर ने विधेयक पर चर्चा के दौरान इसे प्रवर समिति को सौंपने की बात कही.

भाजपा विधायक सिद्धार्थ नाथ सिंह ने सुझाव दिया कि जो लोग पीढ़ी दर पीढ़ी प्रमाणिक है, उनका नवीनीकरण किया जाए. अनाधिकृत रहने वाले लोगों के लिए पहले पुनर्वास की व्यवस्था की जाए. भाजपा विधायक हर्षवर्धन बाजपेई ने प्रयागराज की नजूल संपत्तियों का जिक्र करते हुए कहा कि एक तरफ हम प्रधानमंत्री आवास दे रहे हैं. दूसरी तरफ गरीबों को उजाड़ने जा रहे हैं. यह न्याय संगत नहीं है. उन्होंने भी विधेयक को प्रवर समिति को सौंपने का अनुरोध किया.
जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया ने भी इस विधेयक का विरोध किया है. उनका कहना है कि यह विधेयक भले छोटा हो लेकिन इसके परिणाम बड़े हैं. उन्होंने सवाल किया कि एक प्रकरण में पता चला है कि हाईकोर्ट भी नजूल भूमि पर है तो क्या उसे भी खाली कराया जाएगा. उन्होंने सरकार से विधेयक पर पुनर्विचार करने की अपील की.
निषाद पार्टी के अनिल त्रिपाठी ने संशोधन की मांग करते हुए प्रवर समिति को विधेयक सौंपने की वकालत की. कांग्रेस पार्टी की आराधना मिश्रा मोना ने भी विधेयक को जनविरोधी करार दिया है. प्रदेश के लाखों लोगों को बेघर करने वाला यह विधेयक है. इस विधेयक का व्यापक स्तर पर दुरुपयोग होगा नजूल की भूमि पर सरकारी कार्यालय और अस्पताल भी बने हैं.
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने नजूल भूमि विधेयक को घर उजाड़ने वाला करार दिया है. उन्होंने आरोप लगाया कि जनता रोजी-रोटी रोजगार के लिए भटक रही है और अब भाजपाई उनका मकान भी छीनना चाहते हैं. एनडीए में सहयोगी अनुप्रिया पटेल ने विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि यह विधेयक न सिर्फ गैर जरूरी है बल्कि आम जनमानस की भावनाओं के विपरीत है. उत्तर प्रदेश सरकार को इस विधेयक को तत्काल वापस लेना चाहिए और इस मामले में जिन अधिकारियों ने सरकार को गुमराह किया है उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई हो.
