संभल में शाही जामा मस्जिद पर श्री हरिहर मंदिर की दावेदारी के बाद अब पूरे देश में एक अलग तरह का सिलसिला शुरू हो चुका है. यह सिलसिला है खुद के पुरखों की मिल्कियत पर आज के समय में अपना दावा ठोंकने का. नया मामला शामली के राष्ट्रीय लोकदल से विधायक अशरफ अली खान के पुश्तैनी किले से जुड़ा हुआ है. इलाके के राजपूत भानु प्रताप सिंह ने खुद को अशरफ अली खान के पुश्तैनी किले का वारिस बताते हुए मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक शिकायत की है और शाही किले को वापस दिलाए जाने की मांग की है.
उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार में साझेदार राष्ट्रीय लोकदल के विधायक अशरफ अली खान अब एक नए विवाद से जुड़ गए हैं. अशरफ अली खान का पैतृक आवास शामली के जलालाबाद में है. अशरफ अली खान का निवास एक पुश्तैनी किले में है जिसमें सदियों से उनके पूर्वज रहते चले आए हैं. सन् 1863 के राजस्व अभिलेखों में भी अशरफ अली खान के पूर्वजों का नाम बतौर किले के मालिक दर्ज है.
अशरफ अली खान शामली के थाना भवन विधानसभा क्षेत्र से राष्ट्रीय लोकदल के विधायक हैं. राष्ट्रीय लोकदल अब बीजेपी के साथ केंद्र और राज्य की सत्ता में साझेदार है. 2022 के विधानसभा चुनाव में अशरफ अली खान ने भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता और योगी की पिछली सरकार के मंत्री सुरेश राणा को तगड़ी शिकस्त दी थी.
इलाके के रहने वाले भानुप्रताप सिंह ने अशरफ अली खान के पुश्तैनी किले पर अपना दावा ठोंका है. भानुप्रताप सिंह के मुताबिक वह जलालाबाद के राजा रहे राजा धारू के वंशज है. सन् 1350 के आसपास राजा धारू मनहरखेड़ा नाम के इस इलाके के राजा थे. इससे पहले यह इलाका आचार्य धुम्य के आश्रम और गुरुकुल के लिए जाना जाता था. यह महाभारत का काल रहा है. यह भी कहा जाता है कि इसी इलाके में पांडवों ने अपना अज्ञातवास व्यतीत किया था.

राजा धारू के बेटे करमचंद के सात बेटे थे जिन्होंने मनहरखेड़ा के आसपास राजपूतों के 12 गांव बसाये. यह गांव आज भी मौजूद हैं. राजा गोपाल सिंह के शासनकाल में सन् 1690 के आसपास जलाल खान नाम के एक मुगल सरदार ने इस किले पर अपना अधिकार जमा लिया. राजा से मित्रता करने के बाद वह राजमहल में दाखिल हो गया और उसने अपने कातिलों के जरिए राजा और राज परिवार को जहर देकर मार डाला. राजा की रानियां और छोटी-छोटी बच्चियों को इस दौरान जौहर करना पड़ा था.
जलाल खान ने इस इलाके का नाम भी बदला और इसे जलालाबाद कर दिया. भानुप्रताप सिंह का कहना है कि वह राजा गोपाल सिंह की 16वीं पीढ़ी का वंशज है. भानुप्रताप सिंह के मुताबिक उन्होंने पुरातत्व विभाग के प्रमाण समेत इस मामले की शिकायत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से की है. भानुप्रताप सिंह के मुताबिक उन्हें किला वापस चाहिए और वह इस किले के संरक्षक बनना चाहते हैं. भानु प्रताप सिंह ने ऐलान किया है कि अगर उनको किला वापस नहीं मिलता तो वह इसके लिए आंदोलन भी करेंगे.
राष्ट्रीय लोकदल के विधायक अशरफ अली खान ने बताया कि उन्हें इस शिकायत की जानकारी तो हुई है लेकिन उनके पास किसी भी प्रशासनिक अफसर अथवा पुरातत्व विभाग की ओर से कोई नोटिस नहीं मिला है. अगर कोई नोटिस उन्हें मिलता है तो वह कानूनी रास्ता अख्तियार करेंगे. उनके पुरखों के नाम सन् 1863 से तहसील के बंदोबस्त में इस किले के मालिक बतौर दर्ज हैं. किले से संबंधित सारे कागजात उनके पास हैं. वह सभी कागजात जांचकर्ताओं के सामने पेश करने के लिए तैयार हैं.
बताया जाता है कि सन् 1868 में अशरफ अली खान के पूर्वजों ने सहारनपुर की कोर्ट में दावा किया था कि इलाके की दुकानों, मकान, मंदिरों, सरोवरों व अन्य स्थान के लिए वसूले जाने टैक्स में भी उन्हें हिस्सेदारी मिलनी चाहिए. बताया जाता है कि अशरफ अली खान के पूर्वज इस इलाके के रियासतदार थे.
शामली के एसडीएम सदर हामिद हुसैन ने इस शिकायत पर कार्रवाई करते हुए पुरातत्व विभाग से रिपोर्ट तलब की है. इसके अलावा रेवेन्यू विभाग को चिट्ठी लिखकर किले से संबंधित नक्शा व रेवेन्यू रिकॉर्ड भी मांगा गया है.
सदियों पुराने मामले को लेकर उपजे इस विवाद में प्रशासनिक अफसर की सक्रियता चर्चा का विषय बना हुआ है. ऐसा लगता है कि प्रशासनिक अमला शामली के इस मामले को संभल की तर्ज पर खड़ा करके सरकार की नजरों में अपने नंबर बढ़ाने के लिए तैयार खड़ा है. यही वजह है कि एसडीएम सदर हामिद हुसैन ने बड़ी तत्परता से कागजी कार्रवाई शुरू की है.
